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Who is Brahm?

ब्रह्म कौन है?

आलेख © कॉपीराइट - साधक प्रभात (Sadhak Prabhat)

अलग-अलग उपनिषद् में ब्रह्म की विवेचना निम्न रूप में की गई है -

श्वेताश्वतर उपनिषद अग्नि को सृष्टि का स्वयंभू कारक मानता है पर अग्नि को ब्रह्म नहीं मानता। श्वेताश्वतर उपनिषद् का अग्नि हिरण्यगर्भ है । वह साधारण अग्नि नहीं है। इसी हिरण्यगर्भ अग्नि को कोई अग्नि कहते हैं, कोई मनु कहते हैं, कोई इंद्र, कोई प्राण, कोई सनातन ब्रह्म और कोई प्रजापति कहते हैं। ऋग्वेद में इसी अग्नि को रूद्र कहा गया है एवं इसी से सृष्टि का आरम्भ मन गया है । श्वेताश्वतर उपनिषद् में कह गया है कि "अमृतस्य पुत्रा:" अर्थात सभी प्राणी अमृतस्वरूप परमेश्वर के ही पुत्र हैं। ध्यान दीजिए सभी प्राणी कहा गया है। यानि जन्म से जाति भेद नहीं है। कर्म से संभव है।

छान्दोग्य उपनिषद के अनुसार पदार्थ आकाश से ही उत्पन्न होता है तथा इसीमें विलीन हो जाता है। परंतु आकाश ब्रह्म से भिन्न है। ब्रह्म नहीं है। आकाश सृष्टी का भौतिक कारण है। छान्दोग्य उपनिषद के शंकरभाष्य में कहा गया है कि जो आकाश नाम रूप का निर्वाहक है, वह आकाश भी वही ब्रह्म है।

ब्रह्मसूत्र में कहा गया है कि आकाश पदार्थ परमात्मा है, क्योंकि जगत की उत्पति, स्थिति, प्रलय आदि सभी घटनाएं उस ब्रह्म में हीं घटता है।

तैतरीय उपनिषद् कहता है कि जिस परमात्मा से सब भूत उत्पन्न होते हैं, वह ब्रह्म है।

याद रखें - गीता में मनुष्य को समदर्शी होने का उपदेश दिया गया है। सुख-दुख दुःख में सामान दृष्टि हो।

याद रखें - दार्शनिक अंतरविरोध ही सामाजिक अंतर्विरोध में झलकता है।

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