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भवान्यष्टकम् हिंदी अर्थ के साथ

Lalitapanchakam with Hindi meaning

 
goddess-lalitha-devi
आलेख © कॉपीराइट - साधक प्रभात (Sadhak Prabhat)

श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं ललितापञ्चकं

ललितापञ्चकं के पाठ से माता ललिता शीघ्र ही प्रसन्न होकर विद्या, धन, निर्मल सुख और अनन्त कीर्ति देती हैं।

प्रातः स्मरामि ललितावदनारविन्दं
विम्बाधरं पृथुलमौक्तिकशोभिनासम् ।
आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढ्यं
मन्दस्मितं मृगमदोज्ज्वलभालदेशम् ॥ १ ॥

हिंदी भावार्थ - मैं प्रातःकाल श्रीललितादेवी के उस मनोहर मुखकमल का स्मरण करता हूँ, जिनके बिम्ब समान रक्तवर्ण अधर, विशाल मौक्तिक (नथ में लटकाया हुआ मोती) से सुशोभित नासिका और कर्णपर्यन्त फैले हुए विस्तीर्ण नयन हैं, जो मणिमय कुण्डल और मन्द मुसकान से युक्त हैं तथा जिनका ललाट कस्तूरि के तिलक से सुशोभित है ॥ १ ॥

प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीं
रक्ता‌ङ्गुलीयलसदङ्गुलिपल्लवाढ्याम् ।
माणिक्यहेमवलयाङ्गदशोभमानां
पुण्ड्रेक्षुचापकुसुमेषुसृणीदधानाम् ॥२॥

हिंदी भावार्थ - मैं श्रीललितादेवी की भुजारूपिणी कल्पलता का प्रातःकाल स्मरण करता हूँ, जो लाल अँगूठी से सुशोभित सुकोमल अंगुलिरूप पल्लवोंवाली तथा रत्नखचित सुवर्ण कंकण और अंगदादि से भूषित है एवं जिसने पुण्ड्र-ईंख के धनुष, पुष्पमय बाण और अंकुश धारण किये हैं॥ २ ॥

प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्दं
भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम् ।
पद्मासनादिसुरनायकपूजनीयं
पद्मा‌ङ्कुशध्वजसुदर्शनलाञ्छनाढ्यम् ॥ ३ ॥

हिंदी भावार्थ - मैं श्रीललितादेवी के चरणकमलों को, जो भक्तों को अभीष्ट फल देनेवाले और संसारसागर के लिये सुदृढ़ जहाज रूप हैं तथा कमलासन श्रीब्रह्माजी आदि देवेश्वरों से पूजित और पद्म, अंकुश, ध्वज एवं सुदर्शनादि मंगलमय चिह्नों से युक्त हैं, प्रातः काल नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥

प्रातः स्तुवे परशिवां ललितां भवानीं
त्रय्यन्तवेद्यविभवां करुणानवद्याम् ।
विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहेतुभूतां
विद्येश्वरीं निगमवाड्मनसातिदूराम् ॥ ४ ॥

हिंदी भावार्थ - मैं प्रातःकाल परमकल्याणरूपिणी श्रीललिता भवानी की स्तुति करता हूँ, जिनका वैभव वेदान्तवेद्य है, जो करुणामयी होनेसे शुद्धस्वरूपा हैं, विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लय की मुख्य हेतु हैं, विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं तथा वेद, वाणी और मन की गति से अति दूर हैं ॥ ४॥

प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम
कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति ।
श्रीशाम्भवीति जगतां जननी परेति
वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति ॥ ५ ॥

हिंदी भावार्थ - हे ललिते ! मैं तेरे पुण्य नाम कामेश्वरी, कमला, महेश्वरी, शाम्भवी, जगज्जननी, परा, वाग्देवी तथा त्रिपुरेश्वरी आदि का प्रातःकाल अपनी वाणी द्वारा उच्चारण करता हूँ ॥५॥

यः श्लोकपञ्चकमिदं ललिताम्बिकायाः
सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते ।
तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना
विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनन्तकीर्तिम् ॥ ६ ॥

हिंदी भावार्थ - माता ललिता के अति सौभाग्यप्रद और सुललित इन पाँच श्लोकों को जो पुरुष प्रातःकाल पढ़ता है, उसे शीघ्र ही प्रसन्न होकर ललितादेवी विद्या, धन, निर्मल सुख और अनन्त कीर्ति देती हैं ॥ ६ ॥

॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं ललितापञ्चकं सम्पूर्णम् ॥

॥ इस प्रकार श्रीमत् शंकराचार्यकृत ललितापंचक सम्पूर्ण हुआ ॥

 

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